( दुआ )
दुआओं में है ये कितना असर ,
सिज़दे में झुके हैं उनके जो सिर
कभी उठते क्यूँ नहीं
उट्ठे हैं उनके जो हाथ ,
कभी झुकते क्यूँ नहीं
( मन )
मन तो बे- रहम
मांगे कुछ करम
चाहे कुछ असर
नहीं कोई रहम
मन तो बे -रहम
नीलम मिश्रा
क्या अमरों का लोक मिलेगा तेरी करुणा का उपहार? रहने दो हे देव! अरे यह मेरा मिटने का अधिकार
Friday, September 2, 2011
न जाने क्यूँ तुम्हारा मंदिर मुझे खटक रहा है
रसोई से काम करते समय नज़र जितनी दूर जाती उतनी दूर तक फैली हरियाली मन को मोह लेती थी बस मन खुश तो दुनिया रंगबिरंगी ..............सोचती दिल्ली में भी कहीं कभी इतनी हरियाली देखने को मिलेगी ............पर किस्मत के धनी लोगों को वो सब मिलता है जो कुदरत के पास होता है,सुबह सुबह चिड़ियों का उड़ना ,उनका चह- चहाना दिल को खुश कर देता ,ऐसा लगता हमे किता बड़ा आँगन मिल गया है ..............फिर धीरे धीरे एक छोटा सा मंदिर बना थोडा सा आंगन भक्तों के लिए भी .... चलो दे दिया .पर अब कुछ घुटन सी हो रही है वहां पर एक बड़ा मंदिर बनते देख कर अजीब सी कोफ़्त हो रही है ................कितने सारे पंछियों का बसेरा कितने सारे पेड़ों की छाँव और दूर तक फैली हरियाली मन को शांत करती थी ...............पर अब बैचनी दिनोंदिन बढती जा रही है ......आने वाले कर्म कांडों को सोचकर ,शोर शराबे को सोचकर लोगों के धर्म के नाम पर बढ़ते उन्माद को सोचकर ...............हे ईश्वर हमे माफ़ करना .................पर पहली बार न जाने क्यूँ तुम्हारा मंदिर मुझे खटक रहा है
अपने देश का सावन बाकी है अभी ...........
काले बादल पर उड़ते वो काले पंछी
काली रातों की वो उजली मस्ती ........
पत्तों की सरसराहट ने कह दिया है जैसे उनके कानों में
ए दिल कहीं मत चल अभी ............
अभी तो अपने देश का सावन बाकी है अभी ...........
काली रातों की वो उजली मस्ती ........
पत्तों की सरसराहट ने कह दिया है जैसे उनके कानों में
ए दिल कहीं मत चल अभी ............
अभी तो अपने देश का सावन बाकी है अभी ...........
Monday, August 8, 2011
वो आया सजन
सिन्दूरी सूरज या उजली आस का नवल प्रभात
अल्हड धूप की अलसाई वीरान सूरत ,
सुरमई शाम का कोई सूना आँगन
दूधिया चाँद की शर्मीली रात
प्रकृति ने किया जिसके लिए श्रृंगार ,
वो आया ,वो आया ,वो अब आया सजन
अल्हड धूप की अलसाई वीरान सूरत ,
सुरमई शाम का कोई सूना आँगन
दूधिया चाँद की शर्मीली रात
प्रकृति ने किया जिसके लिए श्रृंगार ,
वो आया ,वो आया ,वो अब आया सजन
Monday, August 1, 2011
चलो ऐसा कर लें कुछ
चलो ऐसा कर लें कुछ
यादों के झरोखों में जब तुम आते हो ,
संग अपने कितनी और शामें लाते हो ,
याद करती हूँ और कितनी ही उन बातों को
जो न तो तुमने कहीं ,न हमने सुनी कभी ,
पर कुछ तो था कि छूटता ही नहीं ,
तुम्हारी गिरफ्त से न मेरी कमजोर पकड़ से ,
चलो आज ऐसा कर ले कुछ
तुम और हम एक और शाम सजाएं ,
न तुम कुछ कहो न हम कुछ सुने
बस एक दूसरे के कंधे पर रखे सर ,
और सुनते रहे दूर से आती उस
मुरली की आवाज वो धुन ,
जो आज भी तुन्हारी और मेरी
साँसों में बसती है ..................
यादों के झरोखों में जब तुम आते हो ,
संग अपने कितनी और शामें लाते हो ,
याद करती हूँ और कितनी ही उन बातों को
जो न तो तुमने कहीं ,न हमने सुनी कभी ,
पर कुछ तो था कि छूटता ही नहीं ,
तुम्हारी गिरफ्त से न मेरी कमजोर पकड़ से ,
चलो आज ऐसा कर ले कुछ
तुम और हम एक और शाम सजाएं ,
न तुम कुछ कहो न हम कुछ सुने
बस एक दूसरे के कंधे पर रखे सर ,
और सुनते रहे दूर से आती उस
मुरली की आवाज वो धुन ,
जो आज भी तुन्हारी और मेरी
साँसों में बसती है ..................
Wednesday, July 13, 2011
तथास्तु ....................(ऐसा ही हो )
तथास्तु ..........(ऐसा ही हो )
क्यूंकि हँसना जरूरी है
हँसो अपने आप पर ,
अपनी नाकामियों पर ,
अपने दुचिन्तन पर ,
अपनी दुश्वारियों पर ,
अपनी कुंठाओं पर ,
अपनी स्वार्थपरता पर ,
अपनी चाटुकारिता पर ,
अपनी क्षुद्र संकीर्णता पर
या फिर
अपनी अस्वस्थ मानसिकता पर
.......................................
दूसरों पर कभी मत हँसो ............
हँसना ही है तो
दूसरों की दूसरों को नाकामयाब करने कि कोशिश पर
उनकी गन्दी राजनीति के दांवपेंच पर
उनकी झूठी छल प्रपंचना पर
उनके किये गए तिरस्कार पर
उनके हतोत्साहित मनोभाव पर
उनके भेदभाव पर ,,उनके जातिवाद पर
याद करते हुए कि इससे पहले खुल कर कब हसे थे ,
कोशिश करो कि इस बार पहले से ज्यादा ही हँसो
इस उम्मीद के साथ कि अगली बार न हो
कोई भी वजह इनमे से हँसने की.............
तथास्तु ....................
क्यूंकि हँसना जरूरी है
हँसो अपने आप पर ,
अपनी नाकामियों पर ,
अपने दुचिन्तन पर ,
अपनी दुश्वारियों पर ,
अपनी कुंठाओं पर ,
अपनी स्वार्थपरता पर ,
अपनी चाटुकारिता पर ,
अपनी क्षुद्र संकीर्णता पर
या फिर
अपनी अस्वस्थ मानसिकता पर
.......................................
दूसरों पर कभी मत हँसो ............
हँसना ही है तो
दूसरों की दूसरों को नाकामयाब करने कि कोशिश पर
उनकी गन्दी राजनीति के दांवपेंच पर
उनकी झूठी छल प्रपंचना पर
उनके किये गए तिरस्कार पर
उनके हतोत्साहित मनोभाव पर
उनके भेदभाव पर ,,उनके जातिवाद पर
याद करते हुए कि इससे पहले खुल कर कब हसे थे ,
कोशिश करो कि इस बार पहले से ज्यादा ही हँसो
इस उम्मीद के साथ कि अगली बार न हो
कोई भी वजह इनमे से हँसने की.............
तथास्तु ....................
Sunday, July 10, 2011
तुम क्यूँ समझोगे ?????
तुम क्यूँ समझोगे ?????
कितनी बार मना किया ,
कि
ऐसे नहीं करते
कि
कभी किसी पर भी
बेवजह फब्तियां नहीं कसते
पर
तुम तो तुम थे ,
सुधरने की भी कोई गुज्जाइश कहाँ थी ??
सोचती रही ,
शायद आज नहीं तो कल तुम समझ जाओगे
कि
हम सब एक ईश्वरीय अंश हैं ,
सब ईश्वर
कि
एक श्रेष्ठ कृति हैं ,
पर तुम्हारे अहम औए तुम्हारे झूठे स्वाभिमान ने
तुम्हे शायद स्वयम सीखा दिया
कि
" अहम ब्रह्मास्मि "
अब तुम्हे कौन समझाए
कि
ब्रह्मा जी ने भी गलतियाँ तो की ही थी ...........
कितनी बार मना किया ,
कि
ऐसे नहीं करते
कि
कभी किसी पर भी
बेवजह फब्तियां नहीं कसते
पर
तुम तो तुम थे ,
सुधरने की भी कोई गुज्जाइश कहाँ थी ??
सोचती रही ,
शायद आज नहीं तो कल तुम समझ जाओगे
कि
हम सब एक ईश्वरीय अंश हैं ,
सब ईश्वर
कि
एक श्रेष्ठ कृति हैं ,
पर तुम्हारे अहम औए तुम्हारे झूठे स्वाभिमान ने
तुम्हे शायद स्वयम सीखा दिया
कि
" अहम ब्रह्मास्मि "
अब तुम्हे कौन समझाए
कि
ब्रह्मा जी ने भी गलतियाँ तो की ही थी ...........
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