Wednesday, July 6, 2011

( दुखों की पोटली )

( दुखों की पोटली )

निकल पड़ी थी अनजान शहर में ,
अनजान चेहरों के बीच ,
कोई भी तो नहीं था जिसे पहचान सकूँ ,
कुछ विस्मय की स्थिति थी ,
पर अपने आप को सम्हालती हुई ,
अपने दुखों को सम्हालती हुई ,
चल ही पड़ी मै ,..........

उधर से राहगीर गुजरा ,
उसकी पोटली ठीक वैसी ,
जैसी की मेरी थी ,,
ईश्वर का चमत्कार था,
या फिर महज एक संयोग ,
दोनों की पोटली बदल गयी थी ,
अनजाने में ही ..............

अब दोनों ढो रहे थे,
एक दूसरे के दुःख
बिना किसी शिकायत के ,
मानो वजह मिल गयी हो ,
एक दूसरे को जीने की .............

(अमृता और इमरोज़ के नाम )

7 comments:

  1. sach me amrita wa imroj the...jab aapne ye likha aur socha...:)
    yaa aap dono...aur dukh kyon...uss potli me agar sukh ho to?????
    god bless you!!

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  2. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (09.07.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  3. वाह, बहुत सुंदर।
    आभार

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