Sunday, October 10, 2010

अनवरत ......... यानि की बिना रुके हुए

अनवरत .........
यानि की बिना रुके हुए

बचपन में दीवाली के दिए से तराजू बनाया करते थे ,
उनका संतुलन साधने के प्रयास में वो ,
वो छोटे हाथ कांपने लगते थे ,
पर धीरे -धीरे हाथ बड़े होते गए ,
संतुलन भी बढ़ता गया ,
तराजू के पलड़ों में ,
आंसू और मुस्कान रखते गए ,
कोशिश इसी बात की रही की
मुस्कान का पलड़ा भारी ,
हो जाए ,
आंसू और मुस्कान अब भी ,
तराजू के पलड़ों पर
नज़र आ जाते हैं अब भी ,
पर मुस्कान का पलड़ा कभी भारी नहीं होता ,
जिन्दगी की इस आपाधापी में ,
सब कुछ देखकर भी
नजरअंदाज कर देती हूँ ,
चल पड़ती हूँ अपने घर की ओर
आंसू और मुस्कान में संतुलन
साधने के प्रयास में
अनवरत ................................
यानि की बिना रुके हुए

Sunday, October 3, 2010

लघुकथा: रेजिगनेशन लेटर (दुर्गा पूजा विशेष)


बनर्जी बाबू ऑफिस की मारामारी से परेशान रहते थे। और आजकल तो अपने बंगाल की लोक संस्कृति को जीवित रखने की इच्छा सनक की हद तक बढ़ चुकी थी |ज्यादा से ज्यादा लोग आयें ,पंडाल को भी पुरस्कार मिल जाय तो क्या कहना! इन दिनों उनकी जिन्दगी दो पाटों में पिस कर रह गई थी |

बीबी तो सहयोग के नाम पर दूर से ही सलाम कर देती थी |मछली -चावल बना कर खाना ,उसके बाद अपने शरीर को किसी भी हद तक बढ़ने के लिए छोड़ते हुए,सारे दिन सोना। आख़िर कोई इतना कैसे सो सकता है? बच्चे अपने कामों में मशगूल थे कि उनसे कुछ कहना सुनना बेकार था। रविन्द्र नाथ की पंक्तियाँ ही उनका सहारा थी(जोदि केऊ डाक सूने ना तोमार ,एकला चोलो रे )कोई तुम्हारी पुकार सुने ना तो अकेले ही चलो। उन्हें मन ही मन गुनगुनाते हुए सुबह शाम दुर्गा पूजा की तैयारी का जायजा लेने पंहुचते थे |गीत -संगीत के कार्यक्रम ,कुछ स्टाल्स स्पोंसर करके कुछ ज्यादा कलेक्शन हो सकता है इस बार।
सारे इंतजाम का जिम्मा उनपर ही था। सब ने उन्हें "बंगाली कल्चरल असोसिअशन " का प्रेसिडेंट जो बना दिया था। "सबसे ज्यादा जिम्मेदार बनना भी ठीक नही होता है या ठीक होता है?" इसी कशमकश के बीच पंडाल की तैयारी देखने पहुंचे। वहाँ पहुचते ही पता लगा कि एक आदमी पंडाल लगाते-लगाते गिर गया है। पैर की हड्डी दो जगह से टूट गई ,इलाज में बीस हजार का खर्चा आएगा। परिवार के सभी लोग गांव में रहते हैं। बनर्जी जी अपनी इस ताजा मुसीबत को देख कर बदहवाश हो गए |उससे मिलने पर पता लगा की वह पाँच सौ रुपये महीने गाँव में भी भेजता था |
पार्टी की कैटरिंग में एक मिठाई और एक सब्जी कम कर देने पर भी सिर्फ़ दो से तीन हजार रुपये ही बच पायेंगे। बनर्जी जी की हालत सिर्फ़ वो ही जानते थे। देखें दुर्गा माँ क्या चमत्कार दिखाती हैं इस बार ?
पंडाल को नॉर्थ जोन का ग्यारह हजार रुपये का अवार्ड मिल ही गया। बनर्जी जी ने एक ठंडी साँस ली सारे रुपये ११०००+३००० +५००० (जो पिछले साल की बचत हुई थी )=१९००० इकट्ठे किए |अगले दिन बेंगाली असोसिएशन की मीटिंग में उन १९००० रुपये का हिसाब दिया।उसमे १००० रुपये अपने पास से मिलाये। एक लिफाफे में रखे और उन सभी को बताया कि ये वो उस मजदूर को देने जा रहे हैं। दूसरा लिफाफा वाइस-प्रेसिडेंट मोहंती जी को दे कर स्कूटर स्टार्ट करके चले गए |
दूसरे लिफाफे को खोलने कि जरूरत नही थी किसी को

--नीलम मिश्रा
(पिछले एक सप्ताह से गन्दी बनियाने पहने सारे दिन हथौडी की ठक-ठक करते हुए,मजदूरों को देखकर दिमाग में यह विचार आया कि बेस्ट पंडाल बनाने वाले को क्या कभी कोई इनाम मिलता है वाकई ????)

Tuesday, September 14, 2010

मासूम सा मन था वो क्यों सोया

त्रिवेणी -कहते हैं शायद इसे

कभी तन्हाईओं में वो गले लगकर इतना रोया


मासूम सा मन था वो क्यों सोया


हिचकियों की आवाजें अभी तक आ रही हैं कहीं दूर से

Tuesday, August 31, 2010

जन्माष्टमी का पर्व और बजरंगबली की जय

जन्माष्टमी का पर्व और बजरंगबली की जय

बाबा झांकी सजायिये ना ,बाबा आपको झांकी सजानी ही पड़ेगी हमे कुछ नहीं पता ,वो बाल -मन ये समझ ही नहीं पाया की बाबा आज बहुत उदास हैं क्यूंकि उनके पोते ,पोती और बेटे बहू ने जो अक्सर उनसे मिलने आते थे ,पिक्चर जाने का प्रोग्राम बनाया है ,और उधर से ही वो लोग घर चले जायेंगे ,बाबा कभी उन लोगों से कुछ नहीं कहते थे ,कभी कोई बात नहीं करते थे बस चुपचाप उनके आने से पहले सारा सामान ला कर रख देते थे ,बाबा से मिलने जाने की बैचैनी बढती जाती थी पर जब तक वो लोग रहते हम हाशिये पर खड़े रहते थे ,और मन ही मन सोचते कि
कब ये लोग जाएँ और हम बाबा के साथ जी भर के बात करें ,पर जब वो लोग होते तो हम दूसरे लोग हो जाते थे ,किरायेदार तो थे हम लोग, पर वो कैसा रिश्ता था हमलोगों का उनसे कोई समझ नहीं सकता .अपने पहले से तय प्रोग्रम के अनुसार वो लोग चले गए और पूरा घर खाली, एक सन्नाटा सा पसर गया ,बाबा बहुत उदास थे हमने समझ लिया था और उनकी उदासी हम ही भगा सकते थे
बाबा अब तो आप झांकी नहीं सजायेंगे हमे पता है आप उदास हैं वो लोग चले गए ना ...........इसलिए .
पर हमलोग तो हैं ना बाबा,आप झांकी सजायिये ना ,बाबा हमारी जिन्दगी का एक अहम हिस्सा थे वो ,गीता पढ़ते और हम भी उनके साथ पढने की कोशिश करते ,
काफी जिद करते और और वो हमारी जिदों को सुनकर या इतना प्यार गैरों से पाकर अपना चेहरा अखबार में छुपा लेते थे .वो अपने आंसू कभी हमे दिखाना नहीं चाहते थे कहीं इतना बड़ा इंसान भी
रोता है कहीं ...........
शाम को एक बार फिर , आप झांकी नहीं सजायेंगे ना ..बाबा कुछ नहीं बोले चुपचाप अखबार पढने का ढोंग करने लगे .
बुझे मन से खाना खाया और सो गए ....
रात के १२ बजे हमे उठाया गया और ले जाया गया,हमारे आश्चर्य की कहीं कोई सीमा नहीं थी वहाँ पर आरती हो रही थी,झांकी भीसजी हुई थी ......
भये कृष्ण कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी
बाबा सिर्फ हमे देख रहे थे उन्होंने पूरी आरती में एक बार भी कृष्ण भगवान् को नहीं देखा
पूरे घर में जैकार लग रही थी बोलो बांके बिहारी की ,बोलो यशोदा मैया की ,बोलो नन्द गोपाल की वो छोटी सी लड़की जोर से बोली, बोलो बजरंगबली की जय..............
बाबा और वो हस दिए
बाबा का नाम था बजरंग बली तिवारी और उस लड़की का नाम था .............................
बाबा आज इस दुनिया में नहीं है ,आखिरी वक़्त ये लड़की उनके पास नहीं थी ................
पर आज भी नहीं भूली उन्हें और न ही जैकारा लगाना उनके नाम का
तो जन्माष्टमी के पावन पर्व पर आप भी मेरे साथ बोलिए
" बजरंगबली की जय"

Thursday, August 5, 2010

दामन -ए -कोह

दामन -ए -कोह था ,
वो जन्नत का नूर था
कोह -ए नूर था ,
कभी जो काश्मीर था...............

Monday, August 2, 2010

बड़ी बेटी

बड़ी बेटी
फूलमती जरा इधर ठीक से लगाना झाड़ू ,अब तुम एक दिन की भी छुट्टी लेती हो तो हमसे काम ठीक से नहीं होता ,"अरे भाभी आप रहने दो मै अभी सब सफा कर दूँगी "कहते हुए फूलमती मेरे निर्देशों का पालन करने लगी, वो क्या हुआ कल तुम अपने बच्चों का दाखिला करवाने गयी थी ?"जी भाभी मै कल गए थी , मझली और उससे छोटी वाली का दाखिला करवा दिया है .अच्छा किया
शिक्षा का असर तो दीखता ही है ,फूलमती सिर्फ चार क्लास पढ़ी है ,पर उसके कपडे पहनने का सलीका ,उसके बात करने का ढंग उसे और कामवालियों से कहीं बेहतर स्थान देता था .यही सोच रही थी कि काम कुछ भी हो पढ़ाई कहीं न कही दिखती जरूर है ,एकदम से दिमाग में कहीं कौंधा कि बड़ी बेटी क्यूँ नहीं ..............................
वो खुद ही बोली भाभी जब मै घर गयी तो बड़ी वाली बेटी ने पूछा कि नाम लिखवा दिया है क्या .......पर मै उससे नजरें नहीं मिला पायी क्यूंकि उसकी पढ़ाई तीन क्लास के बाद रुकवा दी है मैंने ,
बेटे को संभालने के लिए भी तो कोई चाहिए था घर में ...

Monday, July 12, 2010

क्यूँ ????????????????

कैसे -कैसे सवालात लेकर हम घर से निकले !
जो आज भी हमारे साथ हैं
उन सवालों का कोई जवाब नहीं है किसी के पास !
क्यूँ जिन्दगी जीती जानी है ?
क्यूँ उमीदें मरती जानी हैं ?
क्यूँ किस्मत हमको बार बार आजमाती है ?
क्यूँ हमे दरियादिली देकर ,
तंगदिली अपनानी है ,
क्यूँ
बे - बजह
बे -रास्ता
बे - मंजिल
हमे चलते जानी है
वो जिन्दगी जो शुरू हुई ,
और ख़तम भी हुई
अभी यहीं से !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!