अनवरत .........
यानि की बिना रुके हुए
बचपन में दीवाली के दिए से तराजू बनाया करते थे ,
उनका संतुलन साधने के प्रयास में वो ,
वो छोटे हाथ कांपने लगते थे ,
पर धीरे -धीरे हाथ बड़े होते गए ,
संतुलन भी बढ़ता गया ,
तराजू के पलड़ों में ,
आंसू और मुस्कान रखते गए ,
कोशिश इसी बात की रही की
मुस्कान का पलड़ा भारी ,
हो जाए ,
आंसू और मुस्कान अब भी ,
तराजू के पलड़ों पर
नज़र आ जाते हैं अब भी ,
पर मुस्कान का पलड़ा कभी भारी नहीं होता ,
जिन्दगी की इस आपाधापी में ,
सब कुछ देखकर भी
नजरअंदाज कर देती हूँ ,
चल पड़ती हूँ अपने घर की ओर
आंसू और मुस्कान में संतुलन
साधने के प्रयास में
अनवरत ................................
यानि की बिना रुके हुए